दीपावली की शुबगुबाहट होते ही बच्चों घर घरौंना/घरौंदा! तैयारी

संवाददाता
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दीपावली की शुबगुबाहट होते ही हम बच्चों का सबसे बड़ा काम घर घरौंना बनाना होता था। गांव में सारे बच्चे अपने अपने घर पर घरौदा बनाते थे। दिन भर अपने घरौने पर मेहनत करते। बनाते, सजाते, संवारते और थोड़ा सा मौका निकाल कर बाकियों के घरौने को भी झाँक आते कि किसका ज्यादा सुन्दर लग रहा है।


घर में दीपावली है कितने क्या क्या काम है? हमें उससे कोई मतलब नहीं होता था। बस अपने घराउने को सबसे सुन्दर दिखाने की होड़ लगी रहती थी।

स्कूल से आकर बस्ता फेंक कर बिन खाये पिए घरौंने की सेवा में जुट जाते थे।


धान की फ़सल कटने के बाद अपने खेत से लेकर अगल बगल के सबके खेतों में से धान की बलियाँ बीनते, चूहों के बिल खोदकर उनकी संग्रह की हुई बलियाँ भी निकाल लेते। कुछ मेहनत से इकट्ठी करते तो कुछ मौका लगने पर चुरा भी लिया करते थे।


दिन भर बाली बीनते शाम को उसे कूट पीटकर दाने अलग करते साफ करते ताकि उन्हें बेचकर पैसे इकट्ठे किये जाये तभी तो उन पैसों से घराउने को सजाने की सामाग्री आ सकेगी।


इतनी हड़तोड़ मेहनत, चोरी चकारी करने के बाद भी बड़ी मुश्किल से बीस -तीस रूपये इकट्ठा होते थे लेकिन उन रुपयों में भी हमारी दीपावली के लिए खजाना भर सामान मिल जाता था।


कुछ मोमबत्ती घराउने पर सजाने, जलाने के लिए खरीदते, कुछ चुटपुटिया पटाखे की डब्बी लेते जिसे दगाने के लिए गन के पैसे तो होते नहीं थे सो ईंट मार मारकर फोड़ा करते थे। कुछ खतरों के खिलाडी थे जो उंगलियां से सीमेंट की दीवार पर रगड़ कर फोड़ देते थे। एकाध बार हमने कोशिश की तो बढ़िया ढंग से हाथ जला और तिल की तरह खून अंदर जमा होकर निशान बना गया उसके बाद हिम्मत नहीं हुई।
कुछ मुर्गा छाप पटाखे, एक दो डब्बी काले सांप की, कुछ फुलझड़ी ही हमारे लिए पर्याप्त हुआ करती थी।

दीपावली की अगली सुबह जल्दी से उठकर बुझी मोमबत्ती इकट्ठा करते, बिन फूटे पटाखे इकट्ठा करते, रात की जली हुई मिट्टी के दिए भी उठाकर ले आते, फूटे पटाखे भी बीन लाते थे।

इन बची हुई सामाग्री पर बाद में तसल्ली से प्रयोग किये जाते।

मोम गला कर धागा डालकर मोमबत्ती बनाई जाती, असफल होने पर उस पिघली मोम में सरसों तेल डालकर सर्दियों में पैरों, फ़टी एडियों पर लगाने के लिए पेट्रोलियम जेली बना ली जाती, फूटे पटाखे के बचे बारूद इकट्ठा करके एक कागज में लपेट कर बांध कर सुतली बम बनाते जो हर बार बने लेकिन एक बार भी नहीं फ़टे हाँ! उनमे आग लगती तो रंग बिरंगी चिंगारी जरूर छोड़ते।

दीपावली खत्म होने के बाद हमारा आटा चक्की का कारोबार शुरू होता।

दीपावली के दिन जब कुम्हार दीये देने घर आता था तब दीये के साथ साथ हमारी चक्की, कोसा, तराजू, घंटी इत्यादि भी लिए जाते थे। जिनसे हम लोग बाद में घर के दुआर में जमी बालू को आटे की तरह पीसते फिर तराजू से तौलकर बेचा करते थे।

अहा! जब बचपन था तब बड़े ही खूबसूरत वो दिन हुआ करते थे।

बचपन की दीवाली पोस्ट पढ़कर याद आयी हो तो टिप्पणी जरूर करें और अपने अनुभव बताये, अपनी बचपन वाली दीपावली के बारे में बताये।

तस्वीर रेखा कश्यप जी की वाल से ली है

रिपोस्ट

अरूणिमा सिंह

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