
नेपालगन्ज / सर्दियां शुरू होते ही कथरी रजाई की सिलाई! आजी का काम सबसे पहले पुरानी रजाई के पुराने चीथड़े निकाल कर उनकी रुई अलग करना, रुई को धूप लगा कर बोरे में भरना फिर बाबू जी को बोल बोल कर धुनिया के घर भिजवाना।

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धुनिया काका रूई को धुन कर उसके रेशे रेशे अलग अलग करके फिर से नईं कर एकदम नई रजाई बनाकर दे देते थे।
रजाई जब घर आती तब आजी उस पर घर की जां, का पाट, चकिया, सिल जैसे सारे भारी सामान रख कर रजाई दबा कर रखती थीं ताकि रुई अच्छी तरह से दब कर बैठ जाए और चिपक जाए।

तीन चार दिन यही किया जाता था और फिर धूप दिखा कर उसमें बड़की सुई मोटके धागे से सिलाई लगाई जाती थी।
जब मां और काकी रजाई में डोरा डालती थी तब हम बच्चों को उस रजाई या कथरी में सोने पर बड़ा आनंद आता था।
मां हटाती कि सुई कहीं चुभ जाएगी लेकिन हम ढीठ बच्चे फिर भी नहीं हटते थे। दरअसल कथरी पर सोने से ज्यादा रस काकी और मां की बातों को सुनने में आता था जो पता नहीं कहां कहां की बातों का पिटारा खोल कर कथरी बनाते समय किया करती थी।
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आजी के तरीके से बनाई गई रजाई मजाल है कि वर्षों तक ओढ़ने के बावजूद भी रुई इकट्ठी हुई हो। डोरा डालने के बाद आजी कपड़हा से सफेद झक्क रजाई का गिलाफ खरीद कर उस पर नील टीनोपाल चढ़ा कर रजाई पर चढ़ा देती थीं और नई रजाई बन कर तैयार हो जाती थी।
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घर में घर के सभी सदस्यों की अपनी अपनी रजाई बिस्तर के अलावा भी आजी दो तीन जोड़ी रजाई गद्दा बड़के बक्सा में साफ सुथरा रखती थीं जिसे समय समय पर धूप दिखाया करती थी। ये बिस्तर अचानक आए मेहमानों के लिए रखे रहते थे।
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बाकी खाली समय में कथरी बनाते रहना मां और काकी का समय का सदुपयोग था जिससे न पहने जाने वाले कपड़े उपयोग में आ जाते थे, नईं कथरी बन जाती थी और उनका समय भी अच्छा बीत जाता था।

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साभार : अरूणिमा सिंह
